सोयाबीन उत्पादन की उन्नत तकनीक
मध्यप्रदेश में सोयाबीन खरीफ की एक प्रमुख फसल है, यदि उत्पादकता कमी के कारणों पर प्रकाश डालेंगे तो हम पाएंगे की सोयाबीन की खेती वर्तमान में विभिन्न प्रकार की विषम परिस्थितियों से गुजर रही है लगभग प्रतिवर्ष इसकी खेती में लागत व्यय में अत्यधिक वृध्दि परिलक्षित हो रही है । जिससे कृषकों को आर्थिक दृष्टिकोण से ज्यादा लाभ प्राप्त नहीं हो रहा है ।
खेत की तैयारी :-
खाली खेतों में ग्रीष्म कालीन गहरी जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से मार्च माह से 15 मई तक 9–12 इंच गहराई तक करें । जिससे मृदा के भौतिक गुणों में सुधार होगा, जैसे – मृदा में वातायन, पानी सोखने व जल धरण शक्ति में सुधार, मृदा भुरभुरापन, मृदा संरचना इत्यादि में इससे काफी सुधार होगा । खरपतवार नियंत्रण में सहायता प्राप्त होगी । कीड़े मकोड़े तथा बीमारियों के नियंत्रण में एवं उर्वरक प्रबंधन तथा जीवांश पदार्थ के विघटन में गहरी जुताई करना लाभकारी सिध्द होता है ।
बीजोपचार :-
बीज को थायरम + कार्बेन्ड़ाजिम (2:1) के 3 ग्राम मिश्रण अथवा कार्बोक्सीन 2.5 ग्राम अथवा थायोमिथाक्सेम 78 WG 3 ग्राम अथवा ट्राइकोडर्मा विर्डी 5 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करें । बीज को राइजोबियम कल्चर (ब्रेडी जापोनिकम) 5 ग्राम एवं पी.एस.बी. (स्फुर घोलक) 5 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से बोने के कुछ घंटे पूर्व उपचारित करें । पी.एस.बी. 2.50 किलोग्राम प्रति एकड़ की दर से खेत में मिलाने से स्फुर को घुलनशील अवस्था में परिवर्तित कर पौधों को उपलब्ध करने में सहायक होता है ।
बोनी का समय :-
जून के अंतिम सप्ताह से जुलाई के प्रथम सप्ताह के मध्य 4 – 5 इंच वर्षा होने पर बुवाई करें ।
बीज दर :-
बुवाई के पूर्व बीज की अंकुरण क्षमता (70%) अवश्य ज्ञात करें । 100 दानें तीन जगह लेकर गीली बोरी में रखकर औसत अंकुरण क्षमता का आकलन करें । बुवाई हेतु दानों के आकार के अनुसार बीज की मात्रा का निर्धारण करें । पौध संख्या 4 – 4.5 लाख / हे. रखे । छोटे दाने वाली प्रजातियों के लिए बीज की मात्रा 60 – 70 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से उपयोग करें । बड़े दाने वाली प्रजातियों के लिए बीज की मात्रा 80 – 90 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से निर्धारित करें ।
बोने की विधि :-
कम फैलने वाली प्रजातियों जैसे जे.एस. 93-05, जे.एस. 95-60 इत्यादि के लिए बुवाई के समय कतार से कतार की दूरी 40 से.मी. रखें ।
ज्यादा फैलने वाली किस्में जैसे जे.एस. 335, एन.आर.सी. 7, जे.एस. 97-52 इत्यादि के लिए बुवाई के समय कतार से कतार की दूरी 45 से.मी. रखें ।
गहरी काली भूमि तथा अधिक वर्षा क्षेत्रों में रिजर सीडर प्लांटर द्वारा कुंड (नाली) मेंड़ पध्दती या रेजर बेड प्लांटर या ब्राड बेड फरो पध्दती से बुवाई करें ।
बीज के साथ किसी भी प्रकार के रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग न करें ।
प्रजातियों का चयन :-
यथा संभव आधार एवं प्रमाणित बीजों का ही उपयोग करें । कम से कम दो प्रजातियों का चयन करें । क्षेत्रीय अनुकूलता के आधार पर उन्नत किस्मों का चयन करें ।
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प्रजातियाँ
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विशेषताएं
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जे.एस.
335
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- अवधि
:- मध्यम (95 – 100 दिन)
- उपज
:- 25 – 30 क्विंटल / हैक्टेयर
- 100
दानों का वजन 10 – 13 ग्राम
- विशेषताएं
:- अर्द्ध–परिमित वृध्दि किस्म, बैंगनी फूल, रोंये सहित फलियाँ, जीवाणु झुलसा
प्रतिरोधी
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जे.एस.
93-05
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- अवधि
:- अगेती (90 – 95 दिन)
- उपज
:- 20 – 25 क्विंटल / हैक्टेयर
- 100
दानों का वजन 13 ग्राम
- विशेषताएं
:- अर्द्ध–परिमित वृध्दि किस्म, बैंगनी फूल, कम चटकने वाली फलियाँ
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जे.एस.
95-60
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- अवधि
:- अगेती (80 – 85 दिन)
- उपज
:- 20 – 25 क्विंटल / हैक्टेयर
- 100
दानों का वजन 13 ग्राम
- विशेषताएं
:- अर्द्ध–परिमित वृध्दि किस्म, ऊँचाई 45 – 50 से.मी., बैंगनी फूल, फलियाँ कम
चटकती है
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जे.एस.
97-52
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- अवधि
:- मध्यम (100 – 110 दिन)
- उपज
:- 25 – 30 क्विंटल / हैक्टेयर
- 100
दानों का वजन 12 – 13 ग्राम
- विशेषताएं
:- सफेद फूल, पीला दाना, काली नाभी, रोग एवं कीट के प्रति सहनशील, अधिक नमी वाले
क्षेत्रों के लिए उपयोगी
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जे.एस.
20-29
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- अवधि
:- मध्यम (90 – 95 दिन)
- उपज
:- 25 – 30 क्विंटल / हैक्टेयर
- 100
दानों का वजन 13 ग्राम
- विशेषताएं
:- बैंगनी फूल,
पीला दाना, पीला
विषाणु रोग, चारकोल रॉट, बैक्टीरियाल पॉश्चुल एवं कीट प्रतिरोधी
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जे.एस.
20-34
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- अवधि
:- मध्यम (87 – 88 दिन)
- उपज
:- 22 – 25 क्विंटल / हैक्टेयर
- 100
दानों का वजन 12 – 13 ग्राम
- विशेषताएं
:- बैंगनी फूल, पीला दाना,
चारकोल रोट, बैक्टीरियाल पॉश्चुल, पत्ती धब्बा एवं कीट प्रतिरोधी, कम वर्षा में
उपयोगी
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एन.आर.सी.-7
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- अवधि
:- मध्यम (90 – 99 दिन)
- उपज
:- 25 – 35 क्विंटल / हैक्टेयर
- 100
दानों का वजन 13 ग्राम से ज्यादा
- विशेषताएं
:- परिमित वृध्दि, फलियाँ चटकने के लिए प्रतिरोधी, बैंगनी फूल, गर्डल बीटल और
तना मक्खी के लिए सहनशील
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एन.आर.सी.-12
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- अवधि
:- मध्यम (96 – 99 दिन)
- उपज
:- 25 – 30 क्विंटल / हैक्टेयर
- 100
दानों का वजन 13 ग्राम से ज्यादा
- विशेषताएं
:- परिमित वृध्दि, बैंगनी फूल, गर्डल बीटल और तना मक्खी के लिए सहनशील, पीला
मोजैक प्रतिरोधी
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एन.आर.सी.-86
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- अवधि
:- मध्यम (90 – 95 दिन)
- उपज
:- 20 – 25 क्विंटल / हैक्टेयर
- 100
दानों का वजन 13 ग्राम से ज्यादा
- विशेषताएं
:- सफेद फूल, भूरी नाभी एवं रोये, परिमित वृध्दि, गर्डल बीटल और तना मक्खी के
लिए प्रतिरोधी, चारकोल रॉट एवं फली झुलस के लिए मध्यम प्रतिरोधी
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खाद उर्वरक :-
उर्वरक प्रबंधन के अंतर्गत रासायनिक उर्वरकों का उपयोग मृदा परीक्षण के पर किया जाना सर्वथा उचित होता है। रासायनिक उर्वरकों के साथ नाडेप खाद, गोबर खाद, कार्बनिक संसाधनों का अधिकतम (10 – 20 टन / हे.) या वर्मी कम्पोस्ट 5 टन / हे. उपयोग करें । संतुलित रासायनिक उर्वरक प्रबंधन के अंतर्गत संतुलित मात्रा 20:60-80:40:20 (नत्रजन : स्फुर : पोटाश : सल्फर) का उपयोग करें । संस्तुत मात्रा खेत में अंतिम जुताई के पूर्व डालकर भलीभाती मिट्टी में मिला देवें । नत्रजन की पूर्ति हेतु आवश्यकता अनुरूप 50 किलोग्राम यूरिया का उपयोग अंकुरण के पश्चात 7 दिन से डोरे के साथ डालें ।
अनुशंसित खाद एवं उर्वरक की मात्रा के साथ जिंक सल्फेट 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर मिट्टी परीक्षण के अनुसार डालें । गंधक युक्त उर्वरक (सिंगल सुपर फास्फेट) का उपयोग अधिक लाभकारी होगा । सुपर फास्फेट उपयोग न कर पाने की दशा में जिप्सम का उपयोग 2.50 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की दर से करना लाभकारी है । इसके साथ ही अन्य गंधक युक्त उर्वरक का उपयोग किया जा सकता है ।
सोयाबीन फसल में उर्वरकों की अनुशंसित मात्रा :-
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पोषक तत्व (किग्रा./हे.)
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विकल्प – 1
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विकल्प – 2
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विकल्प – 3
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उर्वरक
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मात्रा (किग्रा./हे.)
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उर्वरक
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मात्रा (किग्रा./हे.)
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उर्वरक
|
मात्रा (किग्रा./हे.)
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नत्रजन
(20)
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यूरिया
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44
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डी.ए.पी.
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130
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एन.पी.के.
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200
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फास्फोरस
(60 – 80)
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सुपर
फास्फेट
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400 – 500
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-
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-
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-
|
-
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पोटाश
(40)
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म्यूरेट
ऑफ पोटाश
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67
|
म्यूरेट
ऑफ पोटाश
|
67
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-
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-
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सल्फर
(20)
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-
|
-
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जिप्सम
|
200
|
जिप्सम
|
200
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सिंचाई :-
साधारण सीड ड्रील से बुवाई के समय 5 – 6 कतारों के बाद फरों ओपनर के माध्यम से एक कुंड बनाए । खाली कुंड को डोरा चलाते वक्त गहरा कर दे । इससे अधिक वर्षा की स्थिति में जल संरक्षण होगा । सीड ड्रील के साथ पाटा का उपयोग कारें, जिससे जल संरक्षण एवं उचित पौध संख्या प्राप्त की जा सकती है ।
अंतर्वर्ती खेती :-
अंतर्वर्ती फसलें जैसे सोयाबीन + अरहर (4:2), सोयाबीन + मक्का (4:2), सोयाबीन + ज्वार (4:2), सोयाबीन + कपास (4:1) को जलवायु के अनुसार अपनाएं ।
फसल चक्र :-
निरंतर सोयाबीन चना के स्थान पर सोयाबीन – गेंहू, सोयाबीन – सरसों फसल चक्र को अपनाएं ।
नींदा प्रबंधन :-
फसल को 30 – 45 दिन की अवस्था तक नींदा रहित रखें । इस हेतु फसल उगने के पश्चात डोरे / कुलपे चलावें । इस विधि से प्रभावी नींदा नियंत्रण हेतु आवश्यकता एवं समय के अनुकूल खरपतवारनाशी दवाओं का चयन कर उपयोग करें ।
सोयाबीन फसल के लिये अनुशंसित खरपतवारनाशक :-
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क्र.
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खरपतवारनाशक
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रासायनिक नाम
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मात्रा / हे.
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1.
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बोवनी
के पूर्व उपयोगी (पी पी आई)
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फ्लूक्लोरेलिन
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2.22
लीटर
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ट्राईफ्लुरेलीन
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2.00
लीटर
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2.
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बोवनी
के तुरन्त बाद (पी आई)
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मेटालोक्लोर
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2.00
लीटर
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क्लोमाझोन
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2.00
लीटर
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पेण्डीमिथिलीन
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3.25
लीटर
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डाईक्लोसुलम
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26
ग्राम
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3.
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15
– 20 दिन की फसल में उपयोगी
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इमेजाथायपर
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1.00
लीटर
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क्विजलोफाप
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1.00
लीटर
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फेनाक्सीफाप-पी-इथाइल
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0.75
लीटर
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हेलाक्सीफाप
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135
मि. ली.
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4.
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10
– 15 दिन की फसल में उपयोगी
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क्लोरीम्यूरान
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36
ग्राम
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फसल सुरक्षा :-
एकीकृत कीट नियंत्रण के उपाय अपनाएं जैसे नीम तेल व लाईट ट्रेप्स का उपयोग तथा प्रभावित एवं क्षतिग्रस्त पौधों को निकालकर खेत के बाहर मिट्टी में दबा दें । कीटनाशकों के छिड़काव हेतु 7 – 8 टंकी (15 लीटर प्रति टंकी) प्रति बीघा या 500 लीटर / हे. के मान से पानी का उपयोग करना अतिआवश्यक है ।
जैविक नियंत्रण :-
खेत में “T” आकार की खूटी 20 – 25 / हे. लगाएं । फेरोमोन ट्रेप 10 – 12 / हे. का उपयोग करें । लाईट ट्रेप का उपयोग कीटों के प्रकोप की जानकारी के लिए लगाएं ।
रासायनिक नियंत्रण :-
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कीट
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नियंत्रण
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ब्लू
बीटल
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क्लोरोपायरीफास
/ क्यूनालफास 1.5 लीटर / हे.
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गर्डल
बीटल
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ट्राईजोफास
0.8 लीटर / हे. या इथोफेनप्राक्स 1 लीटर / हे. या थायोक्लोप्रीड 0.75 लीटर / हे.
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तम्बाकू
की इल्ली एवं रोयेंदार इल्ली
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क्लोरोपायरीफास
20 ई.सी. 1.5 लीटर / हे. या इंडोक्साकार्ब 14.5 एस.पी. 0.5 लीटर / हे. या
रेनेक्सीपायर 20 एस.सी. 0.10 लीटर / हे.
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सेमीलूपर
इल्ली
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जैविक
नियंत्रण हेतु बेसिलस थुरिंजिएंसिस / ब्यूवेरिया बेसियाना 1 लीटर या किलोग्राम /
हे. का उपयोग करें ।
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चने
की इल्ली एवं तम्बाकू की इल्ली
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जैविक
नियंत्रण :- चने की इल्ली हेतु एच.ए.एन.पी.वी. 250 एल.ई. / हे. या बेसिलस
थुरिंजिएंसिस / ब्यूवेरिया बेसियाना 1 लीटर या किलोग्राम / हे. का उपयोग करें ।
रासायनिक
नियंत्रण :- रेनेक्सीपायर 0.10 लीटर / हे. या प्रोफेनोफॉस 1.25 लीटर / हे. या
इन्डोक्साकार्ब 0.50 लीटर / हे. या लेम्डा सायहेलोथ्रीन 0.3 लीटर / हे. या
स्पीनोसेड 0.125 लीटर / हे. का उपयोग करें ।
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तना
मक्खी या सफेद मक्खी
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थायोमिथाक्सम
25 डब्लू.जी. 100 ग्राम / हे.
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समेकित रोग प्रबंधन :-
समेकित रोग प्रबंधन वह पध्दती है जिसमे सभी उपलब्ध रोग नियंत्रण के निम्न तरीके एकीकृत कर रोग का नियंत्रण किया जाता है – गर्मी में गहरी जुताई, संतुलित उर्वरक प्रबंधन, सही किस्मों का चयन, बुवाई का समय, बीजदर व पौध संख्या, जल प्रबंधन, रोग ग्रस्त फसल अवशेषों को नष्ट करना, विकल्प परपोषी पौधों का निष्कासन, खरपतवार नियंत्रण, फसल चक्र व अन्तर्वर्तीय फसल, प्रतिरोधी किस्मों का प्रयोग आदि ।
पत्ती धब्बा एवं ब्लाइट :-
नियंत्रण हेतु कार्बेन्डाजिम या थायोफिनेट मिथाईल का 0.05 % (50 ग्राम / 100 लीटर पानी) के घोल का 35 – 40 दिन में छिड़काव करना चाहिए ।
बेक्टीरियल पश्चूल :-
नियंत्रण हेतु रोग रोधी किस्में जैसे एन.आर.सी.-37 का प्रयोग करें । रोग का लक्षण दिखाई देने पर कसुगामाइसिन का 0.2 % (2 ग्राम / लीटर) घोल का छिड़काव करें ।
गेरुआ :-
यह एक फफूँदजनित रोग है जो प्रायः फूल की अवस्था में देखा जाता है जिसके अंतर्गत छोटे – छोटे सूई की नोक के आकार के मटमैले भूरे व लाल भूरे सतह से उभरे हुए धब्बे के रूप में पत्तियों की निचली सतह पर समूह के रूप में पाये जाते है । धब्बों के चारों ओर पीला रंग होता है । पत्तियों को थपथपाने से पीला रंग का पाउडर निकलता है । रोग रोधी किस्में जैसे जे.एस. 20-29, एन.आर.सी.-86 का उपयोग करें । रासायनिक नियंत्रण के अंतर्गत हेक्साकोनाजोल 800 मि.ली. / हे. का छिड़काव करें ।
चारकोल रॉट :-
यह एक फफूँदजनित रोग है इस बीमारी से पौधे की जड़ सड़ कर सुख जाती है । पौधे के तने का जमीन से ऊपरी हिस्सा लाल भूरे रंग का हो जाता है । पत्तियाँ पीली पड़कर पौधे मुरझा जाते है । रोग ग्रसित तने व जड़ के हिस्सों के बाहरी आवरण में असंख्य छोटे – छोटे काले रंग के स्केलेरोशिया दिखाई देते है । रोग सहनशील किस्में जैसे – जे.एस. 20-34, एवं जे.एस. 20-29, जे.एस. 97-52, एन.आर.सी.-86 का उपयोग करें । रासायनिक नियंत्रण के अंतर्गत थायरम+कार्बोक्सीन 2:1 में 3 ग्राम या ट्राईकोडर्मा विर्डी 5 ग्राम / किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करें ।
एंथ्रेक्नोज व फली झुलसन :-
यह एक बीज व मृदा जनित रोग है । सोयाबीन में फूल आने की अवस्था में तने, पर्णवृन्त व फली पर लाल से गहरे भूरे रंग के अनियमित आकार के धब्बे दिखाई देते है । बाद में यह धब्बे फफूंद की काली संरचनाओं व छोटे कांटे जैसी संरचनाओं से भर जाते है । पत्तियों पर शिराओं का पीला-भूरा होना, मुड़ना एवं झड़ना इस बीमारी के लक्षण है । रोग सहनशील किस्में जैसे - एन.आर.सी.-7 व 12 का उपयोग करें । बीज को थायरम+कार्बोक्सीन या केप्टान 3 ग्राम / किलोग्राम बीज की दर से उपचारित कर बुवाई करें । रोग का लक्षण दिखाई देने पर मेंन्कोजेब या जिनेब 2 ग्राम / लीटर का छिड़काव करें ।
कटाई व गहाई :-
फसल की कटाई उचित समय पर कर लेने से चटकने पर दाने बिखरने से होने वाली हानि में समुचित कमी लाई जा सकती है । फलियों के पकने की उचित अवस्था पर (फलियों का रंग बदलने पर या हरापन पूर्णतः समाप्त होने पर) कटाई करनी चाहिए । कटाई के समय बीजों में उपयुक्त नमी की मात्रा 14 – 16 प्रतिशत होनी चाहिए । फसल को 2 – 3 दिन तक धूप में सुखाकर थ्रेशर से धीमी गति (300 – 400 आर.पी.एम.) पर गहाई करनी चाहिए । गहाई के बाद बीज को 3 – 4 दिन तक धूप में अच्छा सूखा कर भण्डारण करना चाहिए ।